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Bastar Culture: राष्ट्रपति भवन में गूंजा बस्तर का गौरव… मांझी-चालकी से मिलीं राष्ट्रपति मुर्मु

देश के सर्वोच्च संवैधानिक भवन राष्ट्रपति भवन में शुक्रवार को एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला, जब पहली बा

राष्ट्रपति भवन में गूंजा बस्तर

नई दिल्ली, 31 जुलाई। Bastar Culture: देश के सर्वोच्च संवैधानिक भवन राष्ट्रपति भवन में शुक्रवार को एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला, जब पहली बार बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और पारंपरिक वेशभूषा का भव्य प्रदर्शन हुआ। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में पहुंचे 209 सदस्यीय बस्तर प्रतिनिधिमंडल का राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आत्मीय स्वागत किया। इस दौरान राष्ट्रपति ने स्वयं सभी अतिथियों को भोजन परोसकर अपनी सादगी और आत्मीयता का परिचय दिया तथा भविष्य में बस्तर दशहरा और बस्तर पंडुम में शामिल होने की इच्छा भी व्यक्त की।

प्रतिनिधिमंडल में गृहमंत्री विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल, बस्तर पंडुम-2026 के विजेता प्रतिभागी, परंपरागत जनजातीय नेतृत्व व्यवस्था के प्रतिनिधि, पद्मश्री सम्मानित विभूतियां, जनप्रतिनिधि तथा वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम-2026 के विजेताओं, परगना मांझी, मांझी, चालकी और पद्मश्री सम्मानित विभूतियों के सम्मान में विशेष भोज का आयोजन किया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से आत्मीय एवं अनौपचारिक चर्चा करते हुए बस्तर की जनजातीय संस्कृति, लोककलाओं और परंपरागत सामाजिक व्यवस्था के बारे में जानकारी ली। उन्होंने कलाकारों और पारंपरिक जनजातीय प्रतिनिधियों का उत्साहवर्धन करते हुए उनकी सांस्कृतिक विरासत की सराहना की।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के आग्रह पर राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर दशहरा उनके हृदय को विशेष रूप से स्पर्श करता है और वे भविष्य में बस्तर दशहरा तथा बस्तर पंडुम में अवश्य शामिल होंगी। उन्होंने भगवान जगन्नाथ की काष्ठ निर्मित प्रतिमा और बस्तर दशहरा की अनूठी परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका इस उत्सव से आत्मीय जुड़ाव रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि मांझी उनके परिवार का हिस्सा हैं और उनके पिता भी मांझी थे।

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर पंडुम छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय परंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव है, जिसने बस्तर की वास्तविक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों ने युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ पर्यटन और स्थानीय रोजगार को भी नई गति प्रदान की है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार के प्रयासों और स्थानीय जनभागीदारी से बस्तर आज शांति, विकास और समृद्धि की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने शिक्षा, सड़क, बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की सराहना करते हुए इसे पूरे देश के लिए गर्व का विषय बताया। साथ ही मांझी और चालकी की सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूमिका को समाज और प्रशासन के बीच एक प्रभावी सेतु बताया।

इस अवसर पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि वे कई बार राष्ट्रपति भवन आए हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने यहां बस्तर की पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में इतने बड़े प्रतिनिधिमंडल को देखा है, जो अत्यंत प्रसन्नता और गौरव का विषय है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि राष्ट्रपति से बस्तर के प्रतिनिधिमंडल की यह आत्मीय भेंट छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर अंचल के लिए गौरव और सम्मान का अवसर है। उन्होंने कहा कि बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों ने जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा दिलाई है। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को बस्तर आने का आमंत्रण देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि उनके आगमन से बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और विकास यात्रा को नई पहचान मिलेगी।

इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति भवन का भ्रमण कर देश की लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक विरासत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी प्राप्त कीं।

झिटकू-मिटकी की कलाकृति बनी आकर्षण का केंद्र

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, प्रेम, समर्पण और लोकआस्था का प्रतीक ‘झिटकू-मिटकी’ स्मृति-चिह्न भेंट किया। लगभग 300 वर्ष पुरानी यह अमर प्रेमगाथा बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जनश्रुति के अनुसार, कठिन अकाल के समय झिटकू और मिटकी ने प्रेम, त्याग और समर्पण की अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत की थी, जिसके कारण उन्हें देवतुल्य सम्मान प्राप्त हुआ। आज बस्तर में झिटकू को ‘खोड़िया राजा’ और मिटकी को ‘गप्पा देई’ के रूप में पूजा जाता है। यह कलाकृति बस्तर की लोकआस्था, सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।

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