नई दिल्ली, 06 अगस्त। Bofors Case: करीब चार दशक तक भारतीय राजनीति और न्यायिक व्यवस्था में चर्चा का विषय रहे बोफोर्स रिश्वत कांड का आखिरकार न्यायिक पटाक्षेप हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में लंबित आखिरी अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि अब इस प्रकरण को आगे बढ़ाने का कोई कानूनी आधार नहीं बचा है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने वकील अजय के. अग्रवाल की उस अपील पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर चुका है। साथ ही वर्ष 2018 में सीबीआई की अपील भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी है। ऐसे में मामले को आगे जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने दिवंगत श्रीचंद पी. हिंदुजा और गोपीचंद पी. हिंदुजा के नाम रिकॉर्ड से हटाने के लिए चार सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा, लेकिन अदालत ने यह कहते हुए मांग ठुकरा दी कि मामला वर्ष 2018 से लंबित है और अब इसमें और देरी नहीं की जा सकती।
गौरतलब है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने 31 मई 2005 को हिंदुजा बंधुओं और स्वीडिश हथियार निर्माता एबी बोफोर्स के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाहियां रद्द कर दी थीं। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई की जांच पर भी सवाल उठाए थे और कहा था कि इस जांच पर सरकारी खजाने से करीब 250 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
बोफोर्स विवाद की शुरुआत 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 1,437 करोड़ रुपये में 400 हॉवित्जर तोपों की खरीद के समझौते से हुई थी। अप्रैल 1987 में स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट में कथित रिश्वतखोरी के आरोप सामने आने के बाद यह मामला देश के सबसे चर्चित राजनीतिक घोटालों में शामिल हो गया था।

