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Raipur: 10 साल से अटका नवा रायपुर का बायोडायवर्सिटी पार्क… अब जल्द होगा डेवलप

रायपुर, 08 सितम्बर। Raipur: वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने विभागीय समीक्षा बैठक में अधिकारियों को वन संरक्षण और विकास कार्यों में तेजी लाने के निर्देश दिए। बैठक में सभी रेंज के सीसीएफ ने अपने-अपने क्षेत्रों में हुए कार्यों, खर्च और बारिश के बाद किए जाने वाले कार्यों की जानकारी दी।

बैठक में नवा रायपुर के प्रस्तावित बायोडायवर्सिटी पार्क को लेकर भी चर्चा हुई। मंत्री ने अधिकारियों को इस परियोजना को जल्द विकसित करने के निर्देश दिए। इसके बाद परियोजना की पड़ताल में सामने आया कि करीब 10 साल पहले घोषित यह योजना अब तक जमीन पर आकार नहीं ले सकी है।

नवा रायपुर में मुक्तांगन के सामने करीब 400 एकड़ क्षेत्र में इस पार्क को विकसित करने की योजना बनाई गई थी। इसमें 200 एकड़ में अलग-अलग वनस्पतियों के समूह और बाकी 200 एकड़ में पर्यटकों के लिए गतिविधियां विकसित की जानी थीं। प्रस्ताव में बटरफ्लाई पार्क, हर्बल गार्डन और नेचर इंटरप्रिटेशन सेंटर जैसी सुविधाएं भी शामिल थीं।

परियोजना को दिल्ली के यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क की तर्ज पर विकसित करने की योजना थी। अगस्त 2018 में दिल्ली से विशेषज्ञों की टीम भी छत्तीसगढ़ पहुंची थी और परियोजना के लिए कंसल्टेंट की नियुक्ति की गई थी। लेकिन परियोजना के लिए बजट जारी नहीं होने के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका।

फिलहाल पार्क के नाम पर यहां ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत लगाए गए पेड़ ही नजर आते हैं। करीब एक दशक बाद भी 400 एकड़ में प्रस्तावित जैव विविधता केंद्र का मूल काम शुरू नहीं हो पाया है।

अवैध कटाई पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश

समीक्षा बैठक में मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि विभाग की सफलता सिर्फ बजट खर्च करने से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखने वाले परिणामों से तय होगी। उन्होंने अधिकारियों को नियमित और साप्ताहिक समीक्षा करने के निर्देश दिए।

मंत्री ने अवैध कटाई की सूचना तुरंत विभाग तक पहुंचाने के लिए मजबूत सूचना तंत्र बनाने और जानकारी मिलते ही कार्रवाई करने को कहा। साथ ही कार्यों की गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता नहीं करने के निर्देश दिए।

इसके अलावा अचानकमार और इंद्रावती टाइगर रिजर्व में सफारी संचालन की दिशा में काम करने तथा कांकेर क्षेत्र में भालुओं के सुरक्षित पुनर्वास के लिए कार्ययोजना तैयार करने को कहा गया। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में प्रकृति के अनुरूप ईको-टूरिज्म विकसित करने और प्लास्टिक व सीमेंट-कंक्रीट के इस्तेमाल को न्यूनतम रखने के निर्देश भी दिए गए।

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