नई दिल्ली, 15 अक्टूबर। Supreme Court Decision: धर्म परिवर्तन और आरक्षण से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के बाद केवल पुराने जातिगत या सामाजिक दर्जे के आधार पर आरक्षण अथवा किसी विशेष समुदाय का प्रमाणपत्र पाने का दावा नहीं किया जा सकता। संबंधित कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही पात्रता तय होगी।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मामले की सुनवाई की। यह विवाद तमिलनाडु में मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र प्राप्त करने से जुड़ा था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला समीर अहमद का है, जिनका पहले नाम परमशिवम था। उनका जन्म तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले में एक हिंदू परिवार में हुआ था। वर्ष 2015 में उन्होंने इस्लाम अपना लिया और अपना नाम बदल लिया। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन किया। तमिलनाडु में मुस्लिम लेब्बाई समुदाय को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत मान्यता प्राप्त है।
हालांकि, संबंधित तहसीलदार ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद समीर अहमद ने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने धर्म परिवर्तन के बाद भी पिछड़े समुदाय से जुड़े होने के आधार पर मान्यता देने की मांग की थी।
मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती
मामले में तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के आदेश का भी उल्लेख किया गया। इस आदेश के तहत विभिन्न सामाजिक वर्गों से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की व्यवस्था की गई थी। मद्रास हाईकोर्ट ने इस आदेश को असंवैधानिक ठहराते हुए समीर अहमद की याचिका खारिज कर दी थी।
इसके बाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। अब शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा है।
अनुसूचित जाति का दर्जा किन धर्मों में मान्य है?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का उल्लेख किया। इस आदेश के तहत निर्धारित पात्रता पूरी करने वाले व्यक्तियों के लिए अनुसूचित जाति का दर्जा हिंदू, सिख और बौद्ध धर्मों में मान्य है।
अदालत के सामने यह सवाल भी था कि धर्म परिवर्तन के बाद कोई व्यक्ति अपने पुराने जातिगत दर्जे के आधार पर अनुसूचित जाति से जुड़े लाभों का दावा कर सकता है या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे लाभों के लिए संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और पात्रता के नियमों का पालन जरूरी है।
धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण पर क्या असर पड़ेगा?
इस मामले में अदालत के फैसले से यह स्पष्ट होता है कि धर्म परिवर्तन के बाद किसी विशेष समुदाय का प्रमाणपत्र या आरक्षण का लाभ पाने के लिए लागू कानूनों और पात्रता की शर्तों को पूरा करना आवश्यक है। केवल धर्म बदलने या पुरानी सामाजिक पहचान का हवाला देने से किसी समुदाय का प्रमाणपत्र अपने आप नहीं मिल जाता।


