ग्वालियर, 14 अगस्त। Gwalior News: देश की आन-बान और शान तिरंगा आज हर भारतीय की पहचान है। लेकिन आजादी से पहले राष्ट्रीय ध्वज का स्वरूप अलग था। तिरंगे के बीच अशोक चक्र की जगह चरखा हुआ करता था। आजादी के बाद इसमें बदलाव किया गया और चरखे की जगह अशोक चक्र को राष्ट्रीय ध्वज का हिस्सा बनाया गया।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित मध्य भारत खादी संघ उन चुनिंदा संस्थाओं में शामिल है, जो आजादी से पहले से राष्ट्रीय ध्वज तैयार करती आ रही है। यहां तिरंगे के बदलते स्वरूप का इतिहास भी देखने को मिलता है। संस्था में पहले चरखे वाले झंडे बनाए जाते थे और बाद में अशोक चक्र वाले तिरंगे का निर्माण शुरू हुआ।
1930 से ग्वालियर में बन रहा तिरंगा
मध्य भारत खादी संघ की नींव वर्ष 1926 में इंदौर में रखी गई थी। बाद में इसका विस्तार हुआ और वर्ष 1930 में ग्वालियर में संस्था का संचालन शुरू हुआ। तभी से यहां राष्ट्रीय ध्वज बनाने का सिलसिला जारी है।
संस्था की स्थापना महात्मा गांधी के चरखा आंदोलन से प्रभावित होकर बाबू तख्तमल जैन ने की थी, जो बाद में मध्य भारत के मुख्यमंत्री भी बने। शुरुआत में इसकी पहली इकाई इंदौर में शुरू हुई, जिसके बाद सबलगढ़ में कार्यालय स्थापित किया गया। 1930 में ग्वालियर में परिसर स्थापित होने के बाद यहां राष्ट्रीय ध्वज का निर्माण लगातार जारी है।
2016 में मिला BIS लाइसेंस
ग्वालियर में लंबे समय से राष्ट्रीय ध्वज का निर्माण हो रहा है, लेकिन वर्ष 2016 में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) से लाइसेंस मिलने के बाद संस्था को ISI मानक के हस्तनिर्मित राष्ट्रीय ध्वज बनाने की मान्यता मिली।
इसके बाद ग्वालियर में तैयार होने वाले राष्ट्रीय ध्वज देश के 18 राज्यों तक पहुंचने लगे। इन्हें सरकारी कार्यालयों, हाईकोर्ट, सचिवालय और मंत्रालयों में भी फहराया जाता है। वर्ष 2016 में ग्वालियर में तैयार तिरंगा 15 अगस्त को दिल्ली के लाल किले पर भी फहराया गया था।
इस साल मिले 1 करोड़ से ज्यादा के ऑर्डर
संस्था के मुताबिक तिरंगे की गुणवत्ता में समय के साथ काफी सुधार हुआ है। पहले सूत से तैयार कपड़ा मोटा होता था, लेकिन अब आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रक्रिया के कारण कपड़ा अधिक रिफाइंड और बेहतर गुणवत्ता का तैयार किया जाता है।
इस साल संस्था को 1 करोड़ रुपये से ज्यादा के ऑर्डर 18 राज्यों से मिले हैं। इनमें करीब 60 लाख रुपये के झंडों की डिलीवरी की जा चुकी है। हालांकि समय कम होने के कारण कुछ ऑर्डर पूरे करने में मुश्किल आ रही है। कर्मचारियों द्वारा दिन-रात तिरंगे तैयार किए जा रहे हैं।
सालभर चलता है तिरंगा बनाने का काम
राष्ट्रीय ध्वज लैब की इंचार्ज नीलू मेक्ले के मुताबिक ग्वालियर में बने तिरंगे की मांग पूरे साल बनी रहती है। इसी वजह से यहां सालभर राष्ट्रीय ध्वज का निर्माण होता है, ताकि 15 अगस्त और 26 जनवरी के लिए आने वाले बड़े ऑर्डर समय पर पूरे किए जा सकें।
संस्था नो-प्रॉफिट, नो-लॉस के आधार पर काम करती है और निर्धारित 25 प्रतिशत मार्जिन रखा जाता है। कच्चे माल की कीमत बढ़ने के बावजूद पिछले दो वर्षों से झंडों की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की गई है। इस वजह से संस्था का मार्जिन प्रभावित हुआ है, लेकिन तिरंगे की कीमतों को स्थिर रखा गया है।
ग्वालियर का यह खादी संस्थान सिर्फ तिरंगे का निर्माण नहीं कर रहा, बल्कि आजादी के पहले के चरखे वाले झंडे से लेकर आज के अशोक चक्र वाले राष्ट्रीय ध्वज तक की यात्रा को भी अपने इतिहास में संजोए हुए है।


